‘मुसलमानों को ओबीसी से बाहर करो’, रिजर्वेशन पर बीजेपी सांसद के लक्ष्मण की डिमांड कितनी सही
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राज्यसभा में बीजेपी सांसद के. लक्ष्मण ने अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण का मुद्दा उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि धर्म के नाम पर ओबीसी आरक्षण का दुरुपयोग किया जा रहा है और कुछ राज्य मुसलमानों को यह आरक्षण दे रहे हैं।
उन्होंने सरकार से मांग की कि ऐसे धर्म आधारित आरक्षण की समीक्षा की जाए और मुसलमानों को इस कोटे से बाहर किया जाए। उनके इस दावे पर विपक्षी दल भड़क गए और संसद से बाहर चले गए। लेकिन क्या संविधान में मुसलमानों को आरक्षण देने का कोई प्रावधान है ? क्या धर्म के आधार पर आरक्षण दिया जा सकता है ? सुप्रीम कोर्ट के फैसले इस बारे में क्या कहते हैं ?
पहले समझते हैं कि संवैधानिक स्थिति क्या है ? क्या धर्म के आधार पर आरक्षण संभव है ?
संविधान के अनुच्छेद 15(1) और 16(2) साफ-साफ कहते हैं कि राज्य किसी भी नागरिक के साथ केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा। इसका सीधा सा अर्थ है कि भारत में सिर्फ धर्म के आधार पर आरक्षण असंवैधानिक है।
अनुच्छेद 15(4) और 16(4) राज्य को अधिकार देते हैं कि वह सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के नागरिकों की तरक्की के लिए विशेष प्रावधान कर सकता है। इसी के तहत वह आरक्षण भी दे सकता है। साफ है कि संविधान स्पष्ट करता है कि आरक्षण का आधार धर्म नहीं हो सकता, बल्कि आरक्षण का आधार सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन होना चाहिए।
इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ का वो फैसला, जो तय करता है बहुत कुछ
जब भी ओबीसी आरक्षण की बात आती है, तो सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की संविधान पीठ की ओर से दिए गए ‘इंदिरा साहनी केस’के फैसले को आधार माना जाता है। इसे मंडल कमीशन पर फैसले के नाम से भी जाना जाता है. इसी से यह तय हुआ था कि मुसलमानों को ओबीसी आरक्षण मिल सकता है या नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में कई बातें साफ की थीं…
- क्लास यानी वर्ग का मतलब सिर्फ हिंदू जाति नहीं हो सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 16(4) में जिस पिछड़े वर्ग की बात की गई है, वह केवल हिंदू धर्म की जातियों तक सीमित नहीं है।
- सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मुसलमान, ईसाई और सिख जैसे समुदायों में भी सामाजिक व्यवस्थाएं और पेशागत आधार पर ऐसे कई समूह हैं, जो सदियों से सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हुए हैं।
- कोर्ट ने कहा कि अगर मुसलमानों के भीतर कोई ऐसा समूह है जो सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा है, तो उसे ओबीसी की सूची में शामिल किया जा सकता है। यह आरक्षण उन्हें मुसलमान होने के कारण नहीं, बल्कि उनके पिछड़ेपन के कारण मिलेगा।
तो कुल मिलाकर फैसला ये बताता है कि सभी मुसलमानों को एक साथ ओबीसी मानकर आरक्षण देना असंवैधानिक है। लेकिन, मुसलमानों के भीतर मौजूद पिछड़े वर्गों जैसे- जुलाहे, बुनकर, बढ़ई, कसाई आदि को ओबीसी का दर्जा देना पूरी तरह से संवैधानिक है।
मंडल कमीशन और पसमांदा मुसलमान का जिक्र कहां ?
- मंडल कमीशन की रिपोर्ट को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 1980 में जब बीपी मंडल ने अपनी रिपोर्ट सौंपी, तो उन्होंने हिंदू समाज की तरह ही मुस्लिम समाज के भीतर भी जातियों या बिरादरियों का गहरा अध्ययन किया था। मंडल कमीशन ने अपनी लिस्ट में 80 से अधिक मुस्लिम समूहों को ओबीसी के रूप में चिन्हित किया था।
- इनमें मुख्य रूप से वे लोग शामिल थे, जो पारंपरिक रूप से निचले माने जाने वाले पेशों से जुड़े थे, जिन्हें अक्सर पसमांदा या पिछड़े मुसलमान कहा जाता है। जैसे अंसारी यानी बुनकर, कुरैशी यानी कसाई, मंसूरी यानी धुनिया और सलमानी यानी नाई आदि।
- इन समूहों को केंद्र और कई राज्यों की ओबीसी सूची में शामिल किया गया है। इन्हें जो आरक्षण मिलता है, वह इस्लाम धर्म के कारण नहीं, बल्कि इनके सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के कारण मिलता है।
आंध्र प्रदेश में कैसे मिला मुसलमानों को आरक्षण
- जब भी मुसलमानों को ओबीसी आरक्षण का मामला उठता है, तो आंध्र प्रदेश का उदाहरण जरूर दिया जाता है। 2004 में आंध्र प्रदेश सरकार ने राज्य के सभी मुसलमानों को 5% आरक्षण देने का आदेश जारी किया। आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने इसे यह कहते हुए तुरंत रद्द कर दिया कि यह केवल धर्म के आधार पर दिया गया आरक्षण है, जो कि संविधान के अनुच्छेद 15(1) और 16(2) का सीधा उल्लंघन है।
- इसके बाद राज्य सरकार ने एक पिछड़ा वर्ग आयोग बनाया. आयोग ने मुसलमानों के भीतर कुछ विशिष्ट पिछड़े समूहों की पहचान की. इसके बाद सरकार ने 2007 में एक नया कानून बनाकर मुसलमानों के केवल उन विशिष्ट पिछड़े समूहों को 4% आरक्षण दिया। इसे ‘ई’ कैटेगरी नाम दिया गया।
- यह मामला अंततः सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने एक अंतरिम आदेश पारित करते हुए इस 4% आरक्षण को जारी रखने की अनुमति दे दी, क्योंकि यह धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि चिन्हित किए गए ‘पिछड़े वर्गों’ के आधार पर था। हालांकि, यह मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के समक्ष अंतिम फैसले के लिए लंबित है।
बंगाल में क्यों फंस गया पेच ?
पश्चिम बंगाल में जब राज्य सरकार ने कई मुस्लिम वर्गों को ओबीसी सूची में शामिल किया, तो कलकत्ता हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया। कोर्ट ने तर्क दिया कि राज्य सरकार ने बिना किसी ‘पिछड़ा वर्ग आयोग’ की सिफारिश के इन वर्गों को ओबीसी सूची में डाल दिया था। इससे मैसेज गया कि यह फैसला राजनीतिक तुष्टिकरण के लिए उठाया गया, न कि वास्तविक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए।
तो बीजेपी सांसद के. लक्ष्मण की मांग कितनी सही ?
सुप्रीम कोर्ट बार-बार कह चुका है कि तुष्टिकरण के लिए या केवल धर्म के नाम पर दिया गया आरक्षण संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। इसकी समीक्षा की मांग करना एक वैध संसदीय कदम है।लेकिन अगर उनकी मांग का यह अर्थ है कि सभी मुसलमानों को ओबीसी कोटे से पूरी तरह बाहर कर दिया जाए, तो यह सुप्रीम कोर्ट के ‘इंदिरा साहनी’ फैसले के सीधे खिलाफ होगा। क्योंकि सुप्रीम कोर्ट मान चुका है कि गैर-हिंदू धर्मों में भी सदियों से पिछड़ापन मौजूद है। उन्हें हक है।
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