शिवसेना ही नहीं, इन पार्टियों में भी चुनाव निशान को लेकर हुआ विवाद
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नई दिल्ली :- Party Symbol Controversy: चुनाव आयोग ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट को असली शिवसेना मानते हुए उसे पार्टी का चुनाव निशान धनुष-बाण आवंटित कर दिया। हालांकि, चुनाव आयोग के खिलाफ ठाकरे गुट ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। बता दें, भारतीय राजनीति में यह पहला मौका नहीं हैं, जब किसी पार्टी में इस तरह का विवाद सामने आया है, पहले भी ऐसे मामले सामने आते रहे हैं। आइए जानते हैं…
समाजवादी पार्टी में भी जनवरी 2017 में चुनाव चिह्न को लेकर विवाद हुआ। उस समय सत्तारूढ़ सपा में गुटबाजी चुनाव आयोग तक पहुंच गई थी। पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने खुद को अपने बेटे अखिलेश यादव के नेतृत्व वाले गुट की तरफ से अध्यक्ष पद से हटाए जाने के बाद पार्टी के सिंबल पर अपना दावा ठोंका था। हालांकि, बाद में चुनाव आयोग ने अखिलेश यादव के गुट वाली पार्टी को ही असली सपा माना और उसे साइकिल चुनाव निशान आवंटित किया।आयोग ने पाया कि अखिलेश के गुट ने 228 विधायकों में से 205, 68 एमएलसी में से 56, 24 सांसदों में से 15, राष्ट्रीय कार्यकारिणी के 46 सदस्यों में से 28 और राष्ट्रीय सम्मेलन के 5731 प्रतिनिधियों में से 4400 के हलफनामे दायर किए थे, जो कुल 5731 प्रतिनिधियों में से 4716 के लिए जिम्मेदार है। इस मामले में मुलायम सिंह यादव के पक्ष की ओर से कोई दावा पेश नहीं किया गया था।5 दिसंबर, 2016 को तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता की मौत के बाद ओ पन्नीरसेल्वम, जिन्हें ओपीएस के नाम से जाना जाता है, मुख्यमंत्री बने, लेकिन उन्हें फरवरी 2017 में भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद जया की सहयोगी शशिकला ने ईपीएस के रूप में जाने जाने वाले एप्पादी के पलानीसामी को मुख्यमंत्री बनाया। अगस्त 2017 में ईपीएस और ओपीएस एक साथ आए और शशिकला और उनके सहयोगी दिनाकरण को अन्नाद्रमुक से निष्कासित कर दिया।उस वर्ष की शुरुआत में, पार्टी के दोनों गुटों शशिकला-दिनाकरन और ईपीएस-ओपीएस ने AIADMK के दो पत्तियों वाले चुनाव निशान पर दावा ठोंक दिया था, जिसके कारण चुनाव आयोग ने इसे फ्रीज कर दिया। 23 नवंबर को आयोग ने ईपीएस-ओपीएस गुट को दो पत्तियों का प्रतीक आवंटित किया। आयोग ने कहा कि उनके गुट को एआईएडीएमके के अधिकांश विधायकों और सांसदों का समर्थन प्राप्त है।
जयललिता- रामचंद्रन विवाद
इससे पहले भी, 1986 में एमजी रामचंद्रन की मौत के बाद भी एआईएडीएमके में चुनाव निशान को लेकर विवाद हुआ था। जयललिता और रामचंद्रन की विधवा जानकी रामचंद्रन दोनों ने पार्टी पर अपना दावा ठोंका। जानकी 24 दिनों तक राज्य की मुख्यमंत्री भी बनीं, लेकिन पार्टी के ज्यादातर सांसदों और विधायकों का समर्थन जयललिता के साथ था, जिसके बाद उन्हें पार्टी का आधिकारिक चुनाव निशान आवंटित किया गया।
लोक जनशक्ति पार्टी
लोक जनशक्ति पार्टी में भी चुनाव निशान की लड़ाई जारी है। चुनाव आयोग ने अक्टूबर 2021 में पार्टी के ‘बंगला’ चुनाव निशान को फ्रीज कर दिया था। पार्टी जून 2021 में विभाजित हो गई थी। पार्टी पर दिवंगत रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान और उनके चाचा पशुपति पारस अपना दावा ठोंक रहे हैं।
तेलुगु देशम पार्टी
तेलुगु देशम पार्टी में भी चुनाव निशान को लेकर तकरार देखने को मिली। बात 1995 की है, जब एनटी रामाराव के दामाद चंद्रबाबू नायडू ने पार्टी में बगावत कर दी। उन्होंने आरोप लगाया कि रामाराव की दूसरी पत्नी लक्ष्मी पार्वती सरकार और संगठन में जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप करती हैं। नायडू के बगावत के बाद लक्ष्मी ने अलग पार्टी बना ली, लेकिन जीत चंद्रबाबू नायडू की हुई। उन्हें पार्टी और चुनाव निशान दोनों मिला। वे मुख्यमंत्री भी बने।
कांग्रेस
जब इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बनीं तो उन्होंने 1969 में कांग्रेस सिंडिकेट के खिलाफ विद्रोह करके पार्टी तोड़ दी और कांग्रेस (आर) के नाम से नई पार्टी बनाई, लेकिन चुनाव आयोग से उनके गुट को असली कांग्रेस नहीं माना गया और न ही ‘बैलों की जोड़ी’ का चुनाव निशान ही दिया गया। इसके बाद इंदिरा ने ‘गाय और बछड़ा’ को अपनी पार्टी का निशाना बनाया, लेकिन चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद फिर उन्होंने नई पार्टी बनाई और उसका चुनाव निशान ‘हाथ’ रखा।
पार्टी और चुनाव निशान पर किसका ज्यादा अधिकार होता है?
बता दें, पार्टी और चुनाव निशान पर उसका ही ज्यादा अधिकार होता है, जिसको ज्यादा विधायकों और सांसदों का समर्थन हासिल होता है। अगर संगठन और सरकार के बीच चुनाव निशान को लेकर विवाद होता है तो चुनाव आयोग सबसे पहले निशान को फ्रीज कर देता है और उसके बाद दोनों पक्षों से पूरे सबूत और दस्तावेज मांगता है। इन सबूतों और दस्तावेजों की जांच के बाद आयोग फैसला करता है कि पार्टी और चुनाव निशान किसका है।
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