नमस्कार 🙏 हमारे न्यूज पोर्टल - मे आपका स्वागत हैं ,यहाँ आपको हमेशा ताजा खबरों से रूबरू कराया जाएगा , खबर ओर विज्ञापन के लिए संपर्क करे 9616953133 / 8318645910,हमारे यूट्यूब चैनल को सबस्क्राइब करें, साथ मे हमारे फेसबुक को लाइक जरूर करें , जब औरंगजेब की बेटी जैबुन्निसा का दिल छत्रपति शिवाजी पर आया – V News Live24

V News Live24

Latest Online Breaking News

जब औरंगजेब की बेटी जैबुन्निसा का दिल छत्रपति शिवाजी पर आया

😊 कृपया इस न्यूज को शेयर करें😊

जैबुन्निसा भले ही औरंगजेब की बेटी थीं, लेकिन उनका व्यवहार उनके चाचा दाराशिकोह की तरह था. शिक्षित, सुसंस्कृत, खूबसूरत और उदार। औरंगजेब को संगीत से जितनी ज्यादा नफरत थी जैबुन्निसा को उतना ही लगाव।

12 मई 1966, वो तारीख जब आगरा किले के दीवान-ए-खास में मुगल बादशाह औरंगजेब और छत्रपति शिवाजी की मुलाकात हुई. दरबार भरा हुआ था. छोटे-बड़े रईस बैठे हुए थे। यह वो समय था जब मुगलों की ताकत अपने चरम पर थी। औरंगजेब अपने शाही दरबार में शिवाजी का इंतजार कर रहा था। तभी जयसिंह का पुत्र राम सिंह दरबार में शिवाजी को लेकर पहुंचता है। शिवाजी के पहुंचते ही दरबार में सन्नाटा छा गया. दरबार में सबकी नजरें शिवाजी पर थीं क्योंकि वो वही शख्स थे जिन्होंने मुगल साम्राज्य का विरोध करने का साहस किया था। मुगलों को चुनौती दी थी।लेखक बाबा साहब देशपांडे अपनी किताब ‘द डेलिवरेंस ऑर इस्केप ऑफ शिवाजी द ग्रेट फ्रॉम आगरा’ में लिखते हैं कि मुलाकात के दौरान औरंगजे़ब ने शिवाजी को एक तय दूरी तक आगे बढ़ने का आदेश दिया। शिवाजी आगे बढ़े और बादशाह को 30 हजार रुपए नजराने के तौर पर भेंट किए।तीन बार झुककर सलाम किया। यह पहला ऐसा मौका था जब शिवाजी ने किसी अन्य धर्म के बादशाह को सलाम किया था।

औरंगजेब ने शिवाजी को अपमानित किया

मुलाकात के बाद उन्हें निम्न श्रेणी के ओहदेवालों लोगों के बीच बैठाया गया। मुलाकात से पहले जय सिंह ने उन्हें बताया था कि दरबार में कैसा व्यवहार करना है और उच्च ओहदेदारों के बीच बैठाया जाएगा, लेकिन हुआ इसके उलट। शिवाजी यह बात समझ गए थे उन्हें जानबूझ अपमानित किया जा रहा है। उन्होंने अपमान को बर्दाश्त नहीं किया और गुस्सा जाहिर कर दिया। ऐसा करते ही वहां हड़कंप मच गया। मुगल बादशाह औरंगजेब ने शिवाजी को बाहर ले जाने का आदेश राम सिंह को दिया।

शिवाजी पर थी औरंगजेब की शहजादी जैबुन्निसा की नजर

इस पूरी घटना को दरबार में परदे के पीछे बैठी औरंगजेब की शहजादी जैबुन्निसा देख रही थी। जैबुन्निसा को पहले ही दरबार में शिवाजी के पहुंचने की खबर मिल चुकी थी। वह शिवाजी की बहादुरी के किस्से सुन चुकी थी और उन्हें देखने की लालसा के साथ दरबार में पहुंची थी। उस वक्त शिवाजी की उम्र 39 साल और जैबुन्निसा 27 वर्ष की थीं।

जैबुन्निसा भले ही औरंगजेब की बेटी थीं, लेकिन उनका व्यवहार उनके चाचा दाराशिकोह की तरह था। शिक्षित, सुसंस्कृत, खूबसूरत और उदार. औरंगजेब को संगीत से जितनी ज्यादा नफरत थी जैबुन्निसा को उतना ही लगाव। यही वजह थी कि वो छद्म नाम से अपने गीत लिखा करती थीं।सोमा मुखर्जी अपनी किताब ‘लर्नेड मुग़ल वुमन ऑफ औरंगज़ेब्स टाइम : जैबुन-निशा’ में लिखती हैं कि कुरान के नियमों और सिद्धांतों की गहरी जानकारी रखने वाली जैबुन्निसा अपने पिता की तरह कट्टर नहीं थी। दरबार में शिवाजी की निडरता और मर्दाना सौंदर्य देखकर वो प्रभावित हो गईं।

जैबुन्निसा ने औरंगजेब से दोबारा शिवाजी को बुलाने को कहा

जैबुन्निसा ने ही अपने पिता औरंगजेब से शिवाजी को दोबारा दरबार में आमंत्रित करने की बात कही। बादशाह मान गया. शिवाजी को दरबार में आने के लिए संदेश भेजने का काम जैबुन्निसा ने किया। शिवाजी दरबार में पहुंचे। इस बार उन्होंने औरंगज़ेब को सलाम तक न किया और कहा, मैं एक शहजादे के रूप में पैदा हुआ हूं और मुझे गुलामों की तरह व्यवहार करना बिल्कुल नहीं आता।

औरंगजेब ने जैबुन्निसा पर किया शक

अपनी बात कहने के बाद शिवाजी ने सिंहासन की तरफ पीठ कर ली। यह बात औरंगजेब को चुभ गई और वो कोई क्रूर आदेश देने वाला ही था कि शिवाजी ने कहा, मैं अपनी मर्यादा के साथ कोई समझौता नहीं कर सकता है, भले ही मेरी जान क्यों न चली जाए। गुस्से में तमतमाए औरंगजेब ने अपने सिपहसलार फुलद खान को आदेश किया कि शिवाजी को नजरबंद करके निगरानी में रखा जाए। ऐसा ही हुआ, लेकिन कुछ समय बाद ही शिवाजी औरंगजेब के सिपहसालारों को चकमा देकर फरार हो गए। औरंगजेब को शक था कि इसमें जैबुन्निसा ने ही शिवाजी की मदद की है।

शिवाजी और जैबुन्निसा की प्रेम कहानी

शिवाजी और जैबुन्निसा के बीच प्रेम कहानी को लेकर इतिहासकारों में अलग-अलग मत रहे हैं। लेखक कृष्णराव अर्जुन केलुस्कर अपनी किताब ‘द लाइफ ऑफ शिवाजी महाराज’ में लिखते हैं, शिवाजी की निडरता और आचरण के कारण जैबुन्निसा उनकी तरफ आकर्षित हुईं। जैबुन्निसा के दिल में उनके के लिए आकर्षण और सम्मान था। इतिहासकार जदुनाथ सरकार इस बात को सच नहीं मानते थे कि दोनों के बीच प्रेम था। उन्होंने 1919 में प्रकाशित ‘स्टडीज़ इन मुग़ल इंडिया’ में लिखा बंगाली लेखक भूदेव मुखर्जी ने अपने एक उपन्यास बताया है कि कैसे दो प्रेमियों ने अंगूठी का आदान-प्रदान किया और अलग हो गए, लेकिन यह सच नहीं, एक कोरी कल्पना है। मराठी इतिहास में उनकी प्रेम कहानी को लेकर कोई तथ्य नहीं शामिल किया गया है।

Whatsapp बटन दबा कर इस न्यूज को शेयर जरूर करें 

Advertising Space


स्वतंत्र और सच्ची पत्रकारिता के लिए ज़रूरी है कि वो कॉरपोरेट और राजनैतिक नियंत्रण से मुक्त हो। ऐसा तभी संभव है जब जनता आगे आए और सहयोग करे.

Donate Now

[responsivevoice_button voice="Hindi Male"]