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हुरियारिनों ने बरसाए ‘प्रेम से पगे लट्ठ

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मथुरा :-  धर्म पर आस्था निहाल है। भक्ति को परम आनंद प्राप्त है। परंपरा में लठामार पारंगत है। लाठियों में प्रेम का लालित्य है। यहां हर लाली राधा है, हर लल्ला कृष्ण है। पुकार में हुरियारिनें हैं, सामने हुरियारे हैं। बरसतीं लाठियों में रंगत गाढ़ी है। मन में राधे राधे की रट है। लठों की मार में नारी शक्ति की जय है। जय है द्वापर की, जिसके वैभव के सामने कलयुग नतमस्तक है।लीलाधर के गांव नंदगांव के मन-मन में मयूर नाच रहा है। दोपहर सांझ की ओर बढ़ रही है। हुरियारे राधा की धरा बरसाना के लिए तैयार हो रहे हैं। द्वापरयुगीन वस्त्र-शस्त्र के साथ गालियों (हास-परिहास) की पोटली भी बांध रहे हैं। कुछ पांव-पांव चल रहे हैं। कुछ वाहनों से निकल रहे हैं। पहले नंदभवन जाना है। कान्हा स्वरूप ध्वज उठाना है। बरसाने में रंग बरसाना है। बरसाने की तीस मिनट की पैदल राह में हर किसी को आमंत्रित कर रहे हैं। रास्ते में श्रीकृष्ण मंदिर संकेत में राधारमण को साथ चलने को कह रहे हैं। गाजीपुर में प्रेम बिहारी के दर्शन कर उन्हें भी बरसाने आने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं। राधा के बरसाने में पहुंच पीली पोखर पर विराम लेते हैं। यहां सहकार का सत्कार उल्लासित है। स्वागत में ठंडाई-पकौड़ा प्रस्तावित है। जलपान के बाद ढाल कसते-कसते गाते हैं। रसिया के रस से तन-मन भीग जाते हैं।

हुरियारे ब्रह्मांचल पर्वत पर पहुंचते हैं। श्रीजी मंदिर में कृष्ण और राधा को अबीर-गुलाल अर्पित करते हैं। यहां रंगों की वर्षा के बीच गालियों की पोटली खुल रही है। राधा और कृष्ण के पक्ष के बीच में ठिठोली हो रही है। सुबह सांझ में बदल गई है। सांझ पर लालिमा छा गई है। मानों ऊपर भगवान भुवन भाव-विभोर हैं, नीचे पृथ्वी पुलकित। मंदिर की सीढ़ियां उतरते ही रंगीली गली में हुरियारिनें घूंघट की ओट में मुस्कुरा रही हैं। हाथ में लठ है। मन में प्रेम का रस ही रस है। उकसाने, रिझाने, हारने और हराने का प्रयत्न परंपरा को आनंदित कर रहा है।

हुरियारिनों ने बरसाए प्रेम के लट्ठ

आनंद ब्रज पर छा गया है। ब्रज जग को भा गया है। हुरियारिनें हुरियारों पर लाठियां बरसा रही हैं। हुरियारे सिर पर ढाल रख उछल-उछल कर खुद को बचा रहे हैं। बता रहे हैं, आज तुम्हारी बारी है, हमने हार स्वीकारी है। कल मेरो गांव, नंदगांव अइयो। हुरियारनें चुनौती स्वीकार करती हैं। नंदगांव यह सोच आनंद की अनुभूित करता है, कल हमारी बारी है। अब नंदगांव में होरी की तैयारी है।आज हास-परिहास के बीच लठामार होली हुई, लेकिन नंदगांव और बरसाना तो द्वापर युग से ऐसी परंपरा का निर्वहन कर रहे हैं। कान्हा और राधा में जो रिश्ता था, उसकी डोर वैसे ही मजबूती से बंधी रहे। इसके लिए आज भी नंदगांव और बरसाना में शादी विवाह नहीं होता। अगर ऐसा हुआ, तो हास-परिहास नहीं होगा। रिश्तों की कड़ी टूट जाएगी।

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