पेनिट्रेशन नहीं हुआ तो इसे रेप नहीं, बल्कि रेप की कोशिश माना जाएगा
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रायपुर :- छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने रेप के एक मामले में सजा बदलकर दुष्कर्म की कोशिश करने का फैसला सुनाया। रेप केस में सजा को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के बाद कोर्ट ने कहा कि अगर घटना के दौरान पेनिट्रेशन नहीं हुआ तो इसे रेप नहीं, बल्कि रेप की कोशिश माना जाएगा।
16 फरवरी के फैसले में हाई कोर्ट ने कहा कि मेडिकल जांच के अनुसार पीड़िता की हाइमन फटी नहीं थी, लेकिन एक उंगली का सिरा वजाइना में डाला जा सकता था, इसलिए थोड़ा पेनिट्रेशन होने की संभावना है। इस आधार पर कोर्ट ने सजा की अवधि कम कर दी।
22 साल पुराने मामले में आया फैसला
दुष्कर्म का यह मामला 22 साल पुराना है। 2004 में धमतरी जिले में एक युवती से दुष्कर्म हुआ था। 2005 में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को रेप का दोषी मानते हुए 7 साल की सजा सुनाई थी। ट्रायल के दौरान आरोपी करीब एक साल तक जेल में रहा। निचली अदालत में दोषी करार देने के बाद उसने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई। जस्टिस नरेंद्र कुमार व्यास की बेंच ने इस केस में सुनवाई की। उन्होंने 16 फरवरी को फैसला भी सुनाया। कोर्ट ने कहा कि बिना पेनिट्रेशन के इजेकुलेशन करना रेप करने की कोशिश मानी जाती है, असली रेप नहीं। जब प्रॉसिक्यूटर के सबूतों पर सही नज़रिए से विचार किया जाता है, तो यह साफ़ है कि असली रेप हुआ ही नहीं है क्योंकि विक्टिम का अपना बयान उसके सबूत के एक स्टेज पर शक पैदा करता है।
मेडिकल रिपोर्ट की भी व्याख्या की
कोर्ट ने यह भी कहा कि इंडिसेंट असॉल्ट को अक्सर रेप की कोशिशों में बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है। इस केस में रेप साबित करना काफ़ी नहीं था क्योंकि पीड़िता की हाइमन सही सलामत थी और रेप के कोई पक्के निशान नहीं थे। क्रॉस एग्जामिनेशन के दौरान पीड़िता ने कहा था कि आरोपी ने अपना प्राइवेट पार्ट उसके अतरंगी अंग के ऊपर रखा लेकिन पेनिट्रेशन नहीं किया। कोर्ट ने यह नतीजा निकाला कि आरोपी के खिलाफ रेप करने की कोशिश का अपराध बनता है क्योंकि पार्शियल पेनेट्रेशन हुआ था। कोर्ट ने दोषी की सज़ा को बदलकर तीन साल और छह महीने कर दिया। उसे बाकी जेल की सज़ा काटने के लिए दो महीने के अंदर सरेंडर करने को कहा गया। आरोपी पक्ष की तरफ से एडवोकेट राहिल अरुण कोचर और लीकेश कुमार ने पक्ष रखा, जबकि पीड़िता की ओर से स्टेट के एडवोकेट मनीष कश्यप पेश हुए।
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