अब चैनल खोलने से पहले जंसम्पर्क के बड़े साहब की परमिशन जरूरी ?
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व्यंग्य – झोला छाप ख़बरी
जंसम्पर्क विभाग का अपना ही अलग रुतबा है। यहाँ फाइलें कम और फैसले ज्यादा चलते हैं। और फैसले भी ऐसे कि “हाँ” तो पत्थर पर लकीर और “ना” तो जैसे संविधान का अंतिम संशोधन। बीच का रास्ता तो शायद किसी पुराने रिकॉर्ड रूम में धूल खा रहा है।
बड़े साहब का जलवा कुछ ऐसा है कि उनकी एक मुस्कान से विज्ञापन की बरसात हो सकती है और एक त्योरी चढ़ी तो पूरा मीडिया सूखा प्रभावित क्षेत्र घोषित हो जाए। अब ऐसे में पत्रकारिता करने वालों की हालत उस किसान जैसी हो गई है जो बादलों को देख-देखकर अंदाज़ा लगाता है कि बारिश होगी या फिर सिर्फ गरज कर निकल जाएंगे।
हाल ही में बड़े साहब का एक बयान सुनने को मिला “चैनल को विज्ञापन क्यों दें ? क्या हमसे पूछकर चैनल शुरू किया था ?”
अब इस एक वाक्य ने पत्रकारिता के पूरे गणित को ही बदल दिया। लगा जैसे अब मीडिया चलाने के लिए कैमरा, माइक और खबरों से ज्यादा जरूरी “परमिशन” हो गई है। यानी अगर आप चैनल खोलना चाहते हैं तो सबसे पहले आपको अपने सपनों की स्क्रिप्ट नहीं, बल्कि आवेदन पत्र तैयार करना पड़ेगा “साहब, चैनल खोल लें क्या?”या आप पार्टनर बनजाओ ?
सोचिए, अगर यही नियम पहले से लागू होता तो क्या बड़े-बड़े मीडिया समूह भी इसी प्रक्रिया से गुजरते ? क्या Adani Group, Reliance Industries या India Today Group ने भी चैनल शुरू करने से पहले जंसम्पर्क के दरबार में दस्तक दी होगी? या बड़े साहब से पूछा जरूर होगा चैनल खोल ले क्या ? या फिर उनके लिए कोई अलग ही “VIP एंट्री गेट” रहा होगा, जहाँ फाइलें नहीं, सीधे फैसले होते हैं। औऱ करोड़ो के विज्ञापन दिए जाते है ?
वैसे भी हमारे सिस्टम में नियमों की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वे सभी के लिए बराबर होते हैं बस लागू अलग-अलग तरीके से होते हैं। आम पत्रकार अगर चैनल शुरू करे और नियम अनुसार विज्ञापन की गुहार लगाए तो उससे पूछा जाता है “किससे पूछकर शुरू किया?”
और बड़े घरानों के लिए सवाल बदल जाता है “और कितना विज्ञापन चाहिए?”
अब जंसम्पर्क विभाग कोई धर्मार्थ संस्था तो है नहीं कि हर चैनल को पालता रहे। उनका भी अपना बजट है, अपनी प्राथमिकताएँ हैं और सबसे बड़ी बात अपनी “प्राथमिक पहचान” है।
कौन अपना है, कौन पराया यह फाइल में नहीं, पहचान में तय होता है। क्योकि अपना न्यूज़ चैनल भी तो अपना ही है यहाँ पत्रकारिता अब खबरों से कम और संपर्कों से ज्यादा चलती है। खबर की धार कितनी भी तेज हो, अगर पहचान की धार कुंद है तो वह सीधे कूड़ेदान में जाती है। और अगर पहचान मजबूत है, तो बिना खबर के भी विज्ञापन की गंगा बह सकती है।
अब सवाल यह नहीं है कि विज्ञापन किसे मिलना चाहिए। सवाल यह है कि क्या विज्ञापन देने का पैमाना पारदर्शी है या फिर वह भी “साहब की इच्छा” पर निर्भर करता है?
क्योंकि जब सिस्टम व्यक्ति-आधारित हो जाता है, तो नियम सिर्फ कागजों में रह जाते हैं और फैसले “मूड” के हिसाब से होने लगते हैं।
छोटे और मंझले पत्रकारों की हालत तो और भी दिलचस्प है। वे न तो इतने बड़े हैं कि उन्हें स्वतः सम्मान मिल जाए, और न ही इतने छोटे कि पूरी तरह नजरअंदाज कर दिए जाएं। वे बस उस बीच की श्रेणी में आते हैं जहाँ उम्मीद ज्यादा होती है और हकीकत कम।
उनके लिए जंसम्पर्क विभाग किसी मंदिर से कम नहीं जहाँ हर बार यह उम्मीद लेकर जाते हैं कि इस बार प्रसाद मिलेगा। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि प्रसाद तो दूर, दर्शन भी नसीब नहीं होते। और फिर वही सवाल गूंजता है “क्या हमसे पूछकर चैनल शुरू किया था ?”
अब इस सवाल का जवाब शायद किसी के पास नहीं है। क्योंकि अगर पत्रकारिता शुरू करने के लिए भी अनुमति लेनी पड़े, तो फिर स्वतंत्र मीडिया का मतलब ही क्या रह जाएगा ?
एक तरफ सरकारें “मीडिया की स्वतंत्रता” की बात करती हैं और दूसरी तरफ जमीनी हकीकत यह है कि स्वतंत्रता भी अब “स्वीकृति” पर निर्भर करती दिख रही है।
बाकी, यह जंसम्पर्क की गाथा है यह यूं ही चलती रहेगी। कभी नियमों के नाम पर, कभी व्यवस्थाओं के नाम पर, और कभी “साहब की मर्जी” के नाम पर। लेकिन एक सच्चाई हमेशा जिंदा रहेगी जब तक समाचार जिंदा है, तब तक सवाल भी जिंदा रहेंगे… और खबरें यूं ही चीखती रहेंगी।
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