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फर्रुखाबाद पुलिस को हाईकोर्ट की फटकार, एक साल बाद भी पुलिस रिपोर्ट दाखिल नहीं; एसपी समेत तीन अधिकारियों को तलब

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–  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केस डायरी के साथ व्यक्तिगत रूप से पेश होने का दिया निर्देश, विवेचना में देरी पर मांगा स्पष्टीकरण

फर्रुखाबाद / प्रयागराज :-  इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फर्रुखाबाद के एक अधिवक्ता के खिलाफ दर्ज एफआईआर के मामले में पुलिस की विवेचना और राज्य सरकार के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। न्यायमूर्ति राजीव मिश्रा और न्यायमूर्ति जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने पुलिस अधीक्षक, क्षेत्राधिकारी (सीओ) और विवेचना अधिकारी को मूल केस डायरी के साथ व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया है। अदालत ने विवेचना में हुई देरी पर अधिकारियों से स्पष्टीकरण भी मांगा है।

मामला अधिवक्ता अवधेश मिश्रा की ओर से दायर याचिका से जुड़ा है। याचिका में 11 अक्टूबर 2025 को थाना कोतवाली फतेहगढ़, फर्रुखाबाद में दर्ज एफआईआर को चुनौती दी गई है। याची की ओर से अधिवक्ता प्रशांत सिंह रिंकू सहित अन्य अधिवक्ताओं ने पक्ष रखा।

अधिवक्ता पर पांच लाख रुपये मांगने का आरोप

प्राप्त जानकारी के अनुसार, अजय चौहान की शिकायत पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी। आरोप है कि अधिवक्ता ने एक मामले में अभियुक्त से पांच लाख रुपये की मांग की थी, ताकि उस मामले की अभियोक्त्री अभियुक्त के पक्ष में गवाही दे सके।

हालांकि, ये आरोप एफआईआर में लगाए गए आरोप हैं। मामले में इनकी सत्यता का निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के दौरान होना है।

एफआईआर को द्वेषपूर्ण कार्रवाई बताकर दी गई चुनौती

याची की ओर से अदालत में दलील दी गई कि एफआईआर कथित रूप से पुलिस अधीक्षक आरती सिंह के इशारे पर द्वेषपूर्ण तरीके से दर्ज कराई गई। याचिका में कहा गया कि हाईकोर्ट ने 9 अक्टूबर 2025 को एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के सिलसिले में पुलिस अधीक्षक को तलब किया था और इसके दो दिन बाद ही अधिवक्ता के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई।

याचिका में यह आरोप भी लगाया गया कि 11 अक्टूबर 2025 की रात करीब 8:30 बजे पुलिस अधीक्षक लगभग 100 पुलिसकर्मियों के साथ याची के घर पहुंचीं। याची की ओर से दावा किया गया कि इस दौरान उनकी पत्नी, बेटे और घरेलू नौकर के साथ मारपीट की गई तथा घर के सामान को नुकसान पहुंचाया गया। इन आरोपों पर संबंधित पक्षों का आधिकारिक पक्ष और न्यायिक निष्कर्ष अलग से महत्वपूर्ण होंगे।

रविवार को गठित हुई थी विशेष पीठ

मामले की गंभीरता और तात्कालिकता को देखते हुए तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के आदेश पर 19 अक्टूबर 2025, रविवार को विशेष पीठ गठित की गई थी। उस दिन अदालत ने राज्य सरकार और प्रतिवादी पक्ष को 29 अक्टूबर 2025 तक जवाबी हलफनामा दाखिल करने का समय दिया था।

इसके साथ ही अंतरिम आदेश के तहत याची की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी गई थी। अदालत ने इस आदेश की जानकारी पुलिस अधीक्षक, फर्रुखाबाद और संबंधित थानाध्यक्ष को तत्काल देने के निर्देश भी दिए थे।

पुलिस रिपोर्ट दाखिल नहीं होने पर अदालत ने जताई नाराजगी

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सवाल किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 193(3) के तहत अपेक्षित पुलिस रिपोर्ट दाखिल की गई है या नहीं। इस पर सरकारी अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि निर्देशों के बावजूद रिपोर्ट अब तक दाखिल नहीं की गई है।

रिपोर्ट दाखिल नहीं होने और विवेचना में हुई देरी पर अदालत ने गंभीर चिंता जताई। पीठ ने कहा कि राज्य के अधिकारियों के आचरण को लेकर वह आशंकित है, क्योंकि करीब एक साल बीतने के बावजूद आवश्यक पुलिस रिपोर्ट अदालत में प्रस्तुत नहीं की गई है।

एसपी, सीओ और विवेचना अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से होना होगा पेश

हाईकोर्ट ने पुलिस अधीक्षक, क्षेत्राधिकारी और विवेचना अधिकारी को मूल केस डायरी के साथ व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया है। अदालत ने विवेचना में हुई देरी को लेकर तीनों अधिकारियों से स्पष्टीकरण देने और अपने-अपने व्यक्तिगत शपथपत्र दाखिल करने को भी कहा है।

22 अक्टूबर 2026 को होगी अगली सुनवाई

मामले की अगली सुनवाई 22 अक्टूबर 2026 को निर्धारित की गई है। अदालत ने तब तक याची की गिरफ्तारी पर रोक से संबंधित अंतरिम आदेश जारी रहने की बात कही है।

अब अगली सुनवाई में यह महत्वपूर्ण होगा कि संबंधित अधिकारी विवेचना में देरी के संबंध में क्या स्पष्टीकरण देते हैं और पुलिस रिपोर्ट दाखिल नहीं होने पर अदालत क्या रुख अपनाती है।

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